
जब भी मैं कविता लिखने बैठती हूं
सोचती हूं कि मेरा विषय क्या होगा!
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा,
द्वापर युग से लेकर त्रेता युग तक
हर काल में संसार का उद्धार करने को जन्मी हूं,
इस संसार को पाप से मुक्त किया मैनें,
पर हर बार बुरा क्यों,
अंत मेरा ही होगा
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा,
राधा बनकर तड़पी हूं मैं सीता बनकर आग पर चली थी,
सती बनकर जली हूं मैं,
फिर भी इस आदमी को मुझ पर आखिर विश्वास कब होगा,
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा...............................
आज मैनें खुले आसमान में पंख फैलाए,
और अपनी प्रतिभा के परचम संसार भर में लहराए,
इस सब के बावजूद मेरे भ्रूण गंदी नालियों में नज+र आए,
कंधे से कंधा मिलाकर चलने का दण्ड,
क्या इतना बड़ा होगा
इस भरे-पूरे संसार में मेरा अस्तित्व कहां होगा........................
आदमी को जन्म देने से लेकर,
उसके अंत तक मैं अपने हर रूप में उसका साथ देती हूं ,
पर जब अपनी खुशियों की बात करती हूं और उससे उम्मीद करती हूं
कि अब तो ये संसार मेरा होगा,
पर फिर मेरा भ्रम टूटता है,
अग्नि के सात फेरे लेने वाला,
लड़का और लड़की में भेदभाव करने वाला ,
कभी मुझे समझ नहीं पाएगा,
अपने पुरूष होने के अहंकार में,
वो सदा मेरी अभिलाषाओं से,
कहीं दूर खड़ा होगा,
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा........................
उमा चौधरी