Friday, November 28, 2008

सपना


सपने कभी सच होते भी है क्या
किसी से पूछे तो भी क्या
हम थोड़े पागल हैं और थोडे मस्त भी
पर ये दिल करे तो भी क्या .................
सपनो की दुनिया रंगीन होती हैं
ऐसा सब कहते हैं पर हम तो इन्हें
जीते है और इन्हीं पर मरते है
हम नहीं जानते कि ये सच होते
भी हैं के नही पर इन्हे महसूस करते हैं.............

Friday, November 21, 2008

तू मेरे संग है


जबसे तुम्हे देखा,
तबसे जागी मन में ये उमंग है।
कुछ कर दिखाना है इस जहां को
क्योंकि तू मेरे संग है।

तुम्हे देख मिलती मुझे प्ररेणाा,
बढ़ता मेरा साहस और होता
मुझे ये आभास है, मैं जहां भी रहूं
तू मेरे साथ है।

तुम मेरे जीवन की नवप्ररेणा
अब तुम ही मेरा आदि और अंत हो
तुम्हारी बाते देती मुझे नवतरंग।
तुमसे ही आए जीवन में नवरंग है।
क्योंकि तू मेरे संग है।

प्रेम है तुझसे अथाह,
ये सत्य है नहीं कोई कथा
न समझना इसे मेरी कल्पना
क्योंकि तू मेरे जीवन का अभिन्न अंग है,
दूर हो जाएंगी अब जीवन से,
दुख की काली घटाएं,
क्योंकि तू मेरे संग है।

उमा चौधरी

Wednesday, November 19, 2008

नारी की विडम्बना


जब भी मैं कविता लिखने बैठती हूं
सोचती हूं कि मेरा विषय क्या होगा!
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा,
द्वापर युग से लेकर त्रेता युग तक
हर काल में संसार का उद्धार करने को जन्मी हूं,
इस संसार को पाप से मुक्त किया मैनें,
पर हर बार बुरा क्यों,
अंत मेरा ही होगा
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा,
राधा बनकर तड़पी हूं मैं सीता बनकर आग पर चली थी,
सती बनकर जली हूं मैं,
फिर भी इस आदमी को मुझ पर आखिर विश्वास कब होगा,
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा...............................
आज मैनें खुले आसमान में पंख फैलाए,
और अपनी प्रतिभा के परचम संसार भर में लहराए,
इस सब के बावजूद मेरे भ्रूण गंदी नालियों में नज+र आए,
कंधे से कंधा मिलाकर चलने का दण्ड,
क्या इतना बड़ा होगा
इस भरे-पूरे संसार में मेरा अस्तित्व कहां होगा........................
आदमी को जन्म देने से लेकर,
उसके अंत तक मैं अपने हर रूप में उसका साथ देती हूं ,
पर जब अपनी खुशियों की बात करती हूं और उससे उम्मीद करती हूं
कि अब तो ये संसार मेरा होगा,
पर फिर मेरा भ्रम टूटता है,
अग्नि के सात फेरे लेने वाला,
लड़का और लड़की में भेदभाव करने वाला ,
कभी मुझे समझ नहीं पाएगा,
अपने पुरूष होने के अहंकार में,
वो सदा मेरी अभिलाषाओं से,
कहीं दूर खड़ा होगा,
इस भरे-पूरे संसार में नारी का अस्तित्व कहां होगा........................
उमा चौधरी

Friday, November 14, 2008

मासूम का दर्द (अरुशी)


वक्त के हाथों हमने धोखा खाया,

जिसे समझा था अपना उसे ही बेगाना पाया,

किसे दोष दे हम, हम नहीं जानते ,

बस अपनी किस्मत को कोस कर ही दिल को समझाया।

तमाशा बन कर रह गई मेरी जिन्दगी

मेरी मौत के बाद भी दुनिया को चैन ना आया,

सुर्खियों मे छाया रहा मेरा जनाजा ,

और लोगों ने उसे खबर बनाया,

कभी उंगुली उठाई घर पर तो कभी पिता को ही क़ातिल बताया ,

अब क्या उम्मीद करें हम इंसाफ की ,

हम ने तो खुद को मौत के बाद भी अंधेरो मे पाया ,

जब रू-ब-रू होंगे उस खुदा से तो बस यही पूछेंगे,

कि क्या सिर्फ इसी दिन के लिए तूने इंसान को बनाया।
छात्रा एमएजेएमसी प्रथम (उमा चौधरी)

Sunday, November 9, 2008

राधा की विरह गाथा




तडपती राधा को छोड़ रूकमण को भगा लाया था वो,


खुद ने तो की हजार शादीयां, पर राधा को कंवारी ही मार डाल आया था वो,


प्रेम का मधुर संगीत सुनाने वाला


दुखः के तार छेड़ आया वो


तड़पती राधा को छोड़ ...........................


इतिहास के पन्नो में दुर तक


लाकर बीच मझधार में गुमनाम सा छोड़ आया था वो,


तडपती राधा को छोड़ ......................................


सबकी दुनिया रंगीन बनाने वाला,


उसे बेरगं कर आया था वो,


गूजती,हस्ती-खेलती,नाचती,


गोकुल और वृंदावन की गलीयों को,


मौन कर आया था वो,


तड़पती राधा को छाड़....................................................


आज भी अगर कोई सच्चे प्रेम की गाथा,बतलाए ,


तो राधा कृष्ण का नाम ही मुख पर आए ,


पर कोई पुछे कृष्ण से बिलखती राधा को छोड़,


क्यों मथुरा चला आया था वो,


तड़पती राधा को छोड़...................................................................


आज की युवा पिढ़ी को बडा भाता है वो,


कुछ कहने पर लोग उसे फोर इग्जम्पल यूज+ करते है,


क्योंकि प्यार की नई डफिनेश्न सिखला आया था वो,


यूज+ अण्ड थ्रो, यूज+ अण्ड थ्रो,बडा अजीब सा लग रहा है


अपने कृष्ण के बारे में,पर जरा कोइ पुछे उसे की खुद तो अमर हुआ इतिहास के,


पन्नो में ,पर बदनाम कर आया था राध को बरखाने की गलीयों में,


तडपती राधा को छोड़.........................................................................


आज भी राधा की पथराई आंखे,रास्ता उसी का देखती है,और पुछती है,


कि क्या यहीं प्यार है अगर यहीं प्यार है,\


तो क्यों उसे प्रमे की परिभाषा बतला आया था वो,


तड़पती राधा को छोड़, रुकमण को भगा लाया था वो,
उमा चौधरी

यही है अतुल्य भारत

अतिथि देवो भव÷ की परंपरा की दुहाई देने वाले देश में एक और विदेशी सैलानी से बलात्कारं। चंडीगढ के एक होटल के बाहर से अगवा की गई जर्मन युवती के साथ हुए इस हादसे से जहां इस सूची में एक और नाम जुडा हैं,वहीं सरकार में बैठे उन लोगो की परेशनी पर चिंता की लकींरे गहरी होना लाजिमीं है जो दुनिया के सामने भारत को सुरक्षित एवं बेहतर पर्यटन केंद्र के रूप में पेश करने और एक दशक के भीतर भारत में विदेशी सेलानियों की सख्या पांच गुणा करने की जुगत में है। पिछले दिंसबर में पर्यटन मंत्रालय की और से जारी एक्शन प्लान में कहा गया था कि भारत आने वाले विदेशी सैलानी का आंकडा वर्ष 2017 के खत्म होते तक 2 करोड़ 50 हजार तक ले जाना है, जो अभी तक50 लाख तक ही पहुंचा है। लेकिन साल के शुरू से लेकर अब तक विदेशी महिला पर्यटकों की हत्या,बलात्कार,व यौन उत्त्पीड़ना की आधादर्जन घटनाओं कें कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली किरकिरी इस मकसदकी राह में कितना बडारोछा बनेगी ,इसका अंदाजा लगा सकते हैं,कि अमेरिकी व ब्रिटया सरकारों ने जनवरी में अपने लागों से सॉ कहा थाकि वे भारत घुमने की योजना बना रहे है तो वहां अपनी सुरक्षा को लेकर सजग रहें। ऐसी चेतावनी किसी भी देया के लिए बदनुमा दाग से कम नहीं आकीं जा सकती है।इस चेतावनी और भारत आने वाले सैलानियों के साथ हुए हादसों पर विदेशी मीडिया ने खुलकर लिखा। सवाल यह है कि विश्व पर्यटन दिवस के मौके पर अपनी नागरीक के साथ हुए इस हादसे पर और पहले भी जर्मन महिलाओं पर हुए यौन अपराधों के मघेनजर वहां की सरकार भीऐसी चेतावनी जारी कर दे तब क्या होगा ? भारत आने वाले सैलानीयों में बड़ा हिस्सा जर्मन लोगा का हैं। वर्ष 2006 कें आकड़ो के अनुसार ,संख्या की दृष्टि से अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा व फ्रांस के बाद जर्मन के सैलानीयों अका पांचवा स्थान हैं। वर्ष 2003 में सातवां और वर्ष 2004 और 2005 में यह स्थान छटा था।यानी भारत के विदेशी मुद्रा भण्डार तें जर्मन सैलानियों का योगदान बढ़ रहा है। मार्च 2006 में उडीसा के डीजीपी के बेटे द्वारा जर्मन की रिसर्च स्कॉलर के साथ अलवर में किए गए बलात्कार की घटना,मार्च 2005 में जोधपुर में एक ऑटोरिक्शा चालक व उसके साथी द्वारा 47 वर्षीय महिला से बलात्कार और इस साल मार्च में गोवा समुद्रतट पर जर्मन महिला के बलात्कार के प्रयासकी घटनाओं को भी विदेशी खासकर जर्मन सैलानी नहीं भुले होगे। ऐसे में क्या भारत सरकार को अपने ÷अतुल्य भारत ÷ अभियान का चेहरा बिगडने से बचाने और दुनिया के सामने ÷भारत ÷ को एक सुरक्षित देश के रूप में पेश करने के लिए कडे कदम नहीं उठाने चाहिए ? मेहमानों को ही अपना शिकार बनाने वाले अपराधियों का हौसला तोड़ने के लिए सख्त सजा देने का प्रावाधान एक शुरुवाती उपाय या कम से कम एक बडी बहस का विषय हो सकता है,लेकिन यहां भी सोचना होगा कि चंद लोगो के ऐसे कृत्य कहीं भारतीयों को विदेश जाने पर वहां लोगो की हिकारत भरी नजरों का निशाना बनने पर मजबूर न कर दें।