
बहुत दिनों बाद सोचा के लिखू कोई कविता,
पर अब तो कोई कविता निकलती ही नही मेरी कलम से ,
ना जाने किस की नज़र लग गई है कसम से ...................................................,
अब तो बस कोमेडी ही नकलती है मेरी कलम से ........,
रस और भावनाओ की निकलती है जंग अब मेरी कलम से ...........................................,
रेडियो की स्क्रिप्ट लिखने की आदत पड़ गई है मुझे कसम से ,
अब नही निकलती कविता मेरी कलम से .......................................................
रोज़ लेकर बैठती हू काजग और कलम ............................
ये सोच कर के आज तो लिख ही डालूगी कोई कविता ............,
पर हर बार निकलती कोमेडी मेरी कलम से ......................................................,
हाय ; ये कैसी विडम्बना है मुझ संग ..........................,
नही भरे जारहे मुझ से प्रेम क रंग ,
साथ ही नही दे रही अब मेरी कलम ,
कवि गोष्टी में मै हो जाती हू शून्य
और मुझसे उम्मीद रखने वाले हो जाते है दंग
फिर झुक जाती है मेरी गर्दन शर्म से............................,
क्या कहू अब नही निकलती कविता मेरी कलम से .......................................
जगह बदल -२ कर भी मैन देखा और सोचा ,
की शायद बन जाये कोई बात ,
पर मुझ पर हावी हुए मेरे हालात ........
बड़ी मुशकील मे हू धर्म से ..............................
अब नही निकलती कविता मेरी कलम से ...........................................................
उमा चौधरी
3 comments:
kuch na kahte hue bhi kavita ban hi jati hai...!!
radio script or kavita ka achhha talmail hai...
Jai HO Mangalmay HO
why what is wrong? aisa kya hua tumhare jeevan mein ki kavita nahi hai ab koi tumhare man mein?
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