Saturday, June 8, 2013

कुछ  दर्द तेरा  है 
कुछ दर्द मेरा है 
तु बने मेरे दर्द का हम दर्द 
बस यही सोच कर इसे कागज  पर उकेरा है ,
                                     
                                                            उमा चौधरी 

Thursday, January 10, 2013

कब बदलेगे हम
आज 21 वी  सदी है जाति - पाती  के बंधन  से हम उपर उठ चुके है
पर ये मात्र एक दिखावा है और एक ढखोसला  है
खुद को इग्लिश सोच का कहने वाले हम ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पश्चमी  रहन सहन को अपनाने वाले हम
आज भी इसा पूर्व पहले की चादर ओढे बैठ है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

आज अपने से नीची जाति से दोस्ती तो कर  सकते है लेकिन प्यार नही!!!!!!!!!!!!!!!
और अगर प्यार हो जाये तो फिर ये गिरी दिवार किसी जंग रोधक सीमेंट से
बन कर मिनटों में तैयार हो जाती है और जिसे तोडना नामुमकिन सा लगता है
फिर होती है हार  प्यार की और खड़ी होती है समझोते की दिवार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ताउम्र जिन्होंने आपको प्यार दिया वही आप से आपका प्यार छीन लेते है
हर ख्वाइश पूरी करने वाले जिंदगी की सब से खुबसूरत चीज़ हमेशा के लिए
हमसे दूर के देते है फिर कहते है बेटा प्यार हर बार एक सा होता कुछ वक़्त
बाद तुम भूल जाओगे और सब ठीक हो जायेगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

हा सब ठीक हो जाएगा इस समाज में उनकी इज्ज़त बच  जाएगी
एक बेममने से रिश्ते में बंध  कर  वो अगले घर चली जाएगी
अपने आचल में झूठी इज्जत और अपने प्यार लिए लाश लिए
फिर से एक नई जिंदगी बसाएगी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

कोई उससे ये पूछने वाला नही है की उसे कितनी तकलीफ होती है
सब  छुप कर वो ताउम्र रोती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

क्या अभी भी लगता है आपको की हम बदल चुके है ????????????????????????????????/



                                                                                               उमा चौधरी 

Sunday, September 16, 2012

kya tha mera kasoor

एक दिन तुमसे  मिलने आएगे जरूर
सवालों की गठड़ी  लिये
पूछेगे तुमसे  आपना गुनाह
आखिर  क्या था मेरा क़सूर

दिन गुजरे ,साल गुजरे
बदल गए तेरी महफ़िलो  के नूर
पर हम वही के वही रह गए
अपने सवालों और याद़ों की गठड़ी  लिए
आपने यादों  के शहर में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सब कुछ बदल कर रख लिया तुमने
ना पता मालूम है ना नंबर ,
जो दिया  था तुमने कभी  अब वो मिलता नही
हवा के रुख की तरह तुम बदल चुके हो
सफ़र पे हम भी निकल चुके है पर
सीने में एक नासूर लिए ,जो तेरी यादो का है
और कोंधता एक सवाल आखिर क्या था मेरा कसूर ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,




                                                                                         उमा चौधरी 

Monday, June 11, 2012

एक विरक्ति है  कही 
मोन मेरी अभिव्यक्ति है कही 
समय  सुर संगीत नही 
तुझ बिन कोई रीत नही 
मुझको कोई चीन नही 
अब नयनो में नींद नही ,,,,,,,,,,,,,,


                                   उमा चौधरी 

Friday, April 20, 2012

                  हाल-ए दिल

कभी बड़ा नजदीक तो कभी मीलो का फासला है
कभी मोहोब्बत की बातो का सिलसिला ,
तो कभी खामोशियो का पहरा  है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कभी तेरा प्यार मेरी मंजिल और तेरा दिल
मेरा डेरा है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तो दुसरे ही  लम्हे में ये अहसास हो
नही ये तो रैन बसेरा है
कभी वो खुशनुमा रात में
तेरे आगोश में मदहोश होती मेरी
सासों को सहेजा है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तो कभी तेरी रुस्वइयो के इल्जामत का बंधा मेरे सर सहरा है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अजीबो-गरीब है दस्ताने मोहोब्बत,.,,,,,,,,,,
कभी इस पे दुनिया का तो कभी वक़्त का पहरा है
ना समझे  वो नादा मेरे हाल-ए-दिल
उसके बिना ये जिंदगी खालिश एक मुश्हरा है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,



                                                                उमा चौधरी

Tuesday, April 17, 2012

नयन नभ निहारते 
मुख दुवार खोले सीप  कहे
बस एक बूँद  उधार
हो अविरल उस  की धारा
जिसे धरा  ना राह दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ना दीप्तीमान  हो रात्री के 
आचल में जडित तारे 
आगर  सूर्य  ना प्रकाश दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

वट वृक्ष  ,  झरने ,पर्वत 
फूल खिला  के यू  जरा मृदुल
माटी को निखर दे ,,,,,,,,,,,,,
श्वेत  जल बूद  में स्वच्छ
  छवि सत्कार दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सुनहरी चुनर ओढे आई 
ऋतु वसंत  निर्मल इन्द्रधनुष  के 
बिखरे  रंग ,,,,,,,,,,,,,,
आ  अब स्वर्ग  को  धरा  पर  उतार  दे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
नयन नभ निहारते ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

यत्र  तत्र  और  सर्वत्र  हो बस प्रेम ही प्रेम  
अंतरमन में ये  शब्द  उतार ले
शुद्ध हो तेरा   अन्तकरण   के स्वयं  ईश उसमे  निवास  ले ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
नयन नभ निहारते ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


                                                                              उमा चौधरी 



Monday, February 20, 2012

चुभन

हम आज कुछ बीते हुए लम्हों को फिर से टटोल रहे थे
की हाथो में अचानक तुम्हारी तस्वीर आगई
या यु कहू की मेरी ज़न्दगी मेरे हाथो में गई ,
बहुत दुर निकल चुकी थी मै अपने सफ़र पे
पर ना जाने क्यों आज सब अधुरा सा लग रहा है
शायद चलते चलते बहुत आगे निकल आई हु मै
के अब इस सफ़र पर आकेली रह गई हु मै ,
बस चन्द लम्हों की कसक है मेरे साथ ,
और जिंदगी भर का सफ़र तय कर रही हु मै .
बस तुझे अपना बनाने की ख्वाइश लिए बैठी हू मै
पर वक़्त रेत की तरह हाथो से फिसल चूका है
अब तो बस उसकी चुभन महसूस कर रही ही मै ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,




उमा चौधरी