Sunday, September 16, 2012

kya tha mera kasoor

एक दिन तुमसे  मिलने आएगे जरूर
सवालों की गठड़ी  लिये
पूछेगे तुमसे  आपना गुनाह
आखिर  क्या था मेरा क़सूर

दिन गुजरे ,साल गुजरे
बदल गए तेरी महफ़िलो  के नूर
पर हम वही के वही रह गए
अपने सवालों और याद़ों की गठड़ी  लिए
आपने यादों  के शहर में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सब कुछ बदल कर रख लिया तुमने
ना पता मालूम है ना नंबर ,
जो दिया  था तुमने कभी  अब वो मिलता नही
हवा के रुख की तरह तुम बदल चुके हो
सफ़र पे हम भी निकल चुके है पर
सीने में एक नासूर लिए ,जो तेरी यादो का है
और कोंधता एक सवाल आखिर क्या था मेरा कसूर ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,




                                                                                         उमा चौधरी 

1 comment:

Vivek Thakur said...
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