हम आज कुछ बीते हुए लम्हों को फिर से टटोल रहे थे
की हाथो में अचानक तुम्हारी तस्वीर आगई
या यु कहू की मेरी ज़न्दगी मेरे हाथो में आ गई ,
बहुत दुर निकल चुकी थी मै अपने सफ़र पे
पर ना जाने क्यों आज सब अधुरा सा लग रहा है
शायद चलते चलते बहुत आगे निकल आई हु मै
के अब इस सफ़र पर आकेली रह गई हु मै ,
बस चन्द लम्हों की कसक है मेरे साथ ,
और जिंदगी भर का सफ़र तय कर रही हु मै .
बस तुझे अपना बनाने की ख्वाइश लिए बैठी हू मै
पर वक़्त रेत की तरह हाथो से फिसल चूका है
अब तो बस उसकी चुभन महसूस कर रही ही मै ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
उमा चौधरी
1 comment:
bahut dino baad apki rachna padi ....achha laga !!
hamesha ki tarah sudar abhiwyakti kuch alag....achha laga apka safar kuch chhutte or paate bad to rha hai warna kuch logo ka safar to tham hi chuka hai...
namaskar !
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