
तुम से अलग हो के बिखर सी गई है जिंदगी
किसी पुरानी किताब के पन्नो की तरहा
थोड़ी पीली,थोड़ी काली और
फट सी गई है जिंदगी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तुम से अलग हो के ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
गुलाब थी कभी अब बबूल हो गई है
महकती खुशबु से अब धूल हो गई है जिंदगी
तुम से अलग हो के बिखर सी गई है जिंदगी
उमा चौधरी
1 comment:
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ
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