Sunday, November 28, 2010

तुम से अलग हो के


तुम से अलग हो के बिखर सी गई है जिंदगी
किसी पुरानी किताब के पन्नो की तरहा
थोड़ी
पीली,थोड़ी काली और
फट सी गई है जिंदगी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तुम
से अलग हो के ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

गुलाब
थी कभी अब बबूल हो गई है
महकती खुशबु से अब धूल हो गई है जिंदगी
तुम से अलग हो के बिखर सी गई है जिंदगी

उमा चौधरी

1 comment:

Unknown said...

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ