
बदलते भारत की ये विडम्बना भारी है
क्या कहू आक्रोश पर आक्रोश जारी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बेशक कितनी ही आधुनिकता क्यों ना हो
पर रूढ़िवादिता का प्रहार समय पर भारी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कितनी ही नाज़ुक भवनों को रोदना मर्दानी है
और जाती पाती के नाम अपनों की बलि चढ़ाना ही बाकि है
खाप पंचायत हो या कोई और बस सपनों को तोडना जारी है
अपने अपनों को खोखले आदर्शो के सामने बेइज्जत करना समझदारी है
गर कोई समझाने को आगे आए तो उसे ये पागल बताये
कमी तो खुद मे है और दुनिया इससे बंदर नज़र आए
एसे मे विचारो क विरोधाभाष जारी है
के क्या कहू आक्रोश पर आक्रोश जारी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
उमा चौधरी
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