
शाम महफूज़ है अँधेरे के आगोश में
इतना दर्द है दिल में के हम नही है अपने होश में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जाने क्यों काफिर लग रहा है ये जमाना ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
के अब क्या कहें खानाबदोश में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरे बाद रंगीन हो गई है उसकी दुनिया
और वो मेरे अरमानो को सजाये बैठे है शामे नोश में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
उमा चौधरी
2 comments:
कम शब्दो मे अच्छी भावनायें
bahut sundar !! kafi dino baad aapko pada achha laga!!!
JAI HO MANGALMAY HO
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