Wednesday, September 15, 2010

हर तरफ अँधेरा ही अँधेरा है


शाम महफूज़ है अँधेरे के आगोश में

इतना दर्द है दिल में के हम नही है अपने होश में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

जाने क्यों काफिर लग रहा है ये जमाना ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

के अब क्या कहें खानाबदोश में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


मेरे बाद रंगीन हो गई है उसकी दुनिया

और वो मेरे अरमानो को सजाये बैठे है शामे नोश में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

उमा चौधरी

2 comments:

alka mishra said...

कम शब्दो मे अच्छी भावनायें

Unknown said...

bahut sundar !! kafi dino baad aapko pada achha laga!!!

JAI HO MANGALMAY HO