Tuesday, September 21, 2010
आक्रोश पर आक्रोश जारी है

बदलते भारत की ये विडम्बना भारी है
क्या कहू आक्रोश पर आक्रोश जारी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बेशक कितनी ही आधुनिकता क्यों ना हो
पर रूढ़िवादिता का प्रहार समय पर भारी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कितनी ही नाज़ुक भवनों को रोदना मर्दानी है
और जाती पाती के नाम अपनों की बलि चढ़ाना ही बाकि है
खाप पंचायत हो या कोई और बस सपनों को तोडना जारी है
अपने अपनों को खोखले आदर्शो के सामने बेइज्जत करना समझदारी है
गर कोई समझाने को आगे आए तो उसे ये पागल बताये
कमी तो खुद मे है और दुनिया इससे बंदर नज़र आए
एसे मे विचारो क विरोधाभाष जारी है
के क्या कहू आक्रोश पर आक्रोश जारी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
उमा चौधरी
Wednesday, September 15, 2010
हर तरफ अँधेरा ही अँधेरा है

शाम महफूज़ है अँधेरे के आगोश में
इतना दर्द है दिल में के हम नही है अपने होश में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जाने क्यों काफिर लग रहा है ये जमाना ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
के अब क्या कहें खानाबदोश में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरे बाद रंगीन हो गई है उसकी दुनिया
और वो मेरे अरमानो को सजाये बैठे है शामे नोश में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
उमा चौधरी
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