
बचपन का जमाना होता था ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
खुशियों का खजाना होता था ,
चाहत चाँद को पाने की ,
दिल तितली का दीवाना होता था,
खबर न थी सुबह की ना शाम का ठिकाना होता था ,
थके हारे स्कूल से आते ,
पर खेलने भी जाना होता था
दादी की कहानी होती हती
परियो का फसाना होता था ,
कागज़ की कश्ती थी ,
हर मोसम सुहाना होता था,
हर खेल में साथी होते थे ,
हर रिश्ता निभाना होता था,
पापा की वो डांट गलती पर
मम्मी का मनाना होता था ,
गम की जुबान न होती थी
ना जख्मो का पैमाना होता था ,
रोने की वजह ना होती थी
ना हसने का बहाना होता था ,
अब नही रही वो जिंदगी ,
जैसा बचपन का जमाना होता था
उमा चौधरी
1 comment:
वाह वाह्……………सच कह दिया।
जाने कहाँ गये वो दिन????????
अब तो सिर्फ़ यही कह सकते हैं।
कोई लौटा दे मेरे बीते हुयेदिन
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