
ये जग पूछे मुझ से,
इतनी सुंदर रचना कैसे होए?
तो मैं मंद मुस्काए के बोलू ,
जब मन में पीडा होए ,
तो रचना खुद-ब-खुद होए.......................
कोइ कहे ये प्रेम की मधुर पीडा,
तो कोइ कहे कि विरह के बादल छाए,
ना जाने कोइ भक्ति रस,
सब अपने-अपने अर्थ लगाए.......................
ईशवर प्रमे है सबसे सुंदर,
इस में मन है हम खोए,
जब ना हो अपने ईश के र्दशन,
तो काहे मन ना रोए.......................................
प्रभु भक्ति में लीन ये तन-मन,
सुद-बुद अपनी खोए,
तु क्या जाने रे विकारी मनुष्य,
के ईश प्रेम क्या होए.........................
मैं मेरे कृष्णा की दासी,
मेरी आंखे दर्शन की प्यासी,
ना मैं राधा,ना रूकमण,
ना मैं मीरा जैसी प्यारी,
मैं तो मेरे कृष्णा कि बगिया,
की इक छोटी सी क्यारी..........................
ना रास रचाए मुझ संग,
ना मुरली की धुन ही सुनाए,
मेरा मन तेरे प्रेम का प्यासा,
क्या प्यासा ही रह जाए...............................
जो प्रेम करे कान्हा से,
क्यों ये जग उस पर उगली उठाए,
भक्ति भाव में लिप्त ये मन तो,
क्यों ये जग उस पर कलंक लगाए,
प्रभु मिलन की आस लिए,
ये नैना पल-पल रोए,
जब मन में पीडा होए,
तो रचना खुद-ब-खुद होए...........................
उमा चौधरी
